क्या अमेरिका वार एडिक्ट देश है?

अमेरिकी सत्ता धारी वर्ग युद्ध प्रेमी हैं। विगत 80 वर्षों से विश्वस्तर अमेरिकी भूमिका से आप इस यथार्थ को समझ सकते हैं। हमने कई तरह के रक्तपायी मानसिकता देखी है। एक साइकोकिलर शब्द है। यानी मनोरोगी हत्यारा। जिसको हत्या के बाद बहता खून और तड़पता इंसान देखने से सुख मिलता है। इसी तरह से नशे के आदी यानी एडिक्ट होते है। जिन्हें नशीले पदार्थो के बिना चैन नहीं मिलता। वे नशीली चीजों के सेवन के लिए कोई न कोई बहाना या तर्क गढ़ लेते हैं।

आज अमेरिकी राज व्यवस्था शायद इसी तरह की युद्ध एडिक्ट व्यवस्था है। जो दुनिया में किसी लक्षित देश पर युद्ध थोपने और वहां के नागरिकों का नरसंहार करने लिए तर्क गढ़ती है। अपनी विशालकाय पूंजी की ताकत प्रचार तंत्र और गुलाम शासकों के गिरोह के द्वारा इस गढ़े झूठ को प्रचारित कर लोकप्रिय बनाती है और लक्षित सरकारों और उनके शासकों का दानवीकरण करते हुए उन देशों पर युद्ध थोपती है।

वहां की अमूल्य संपदा लूटने के लिए कठपुतली सरकारें और पिट्ठू नेताओं को खड़ा कर उस देश को गुलाम बना लेती है। पिछले 80 वर्षों में हमने ऐसी सैकड़ों घटनाएं देखी हैं। जहां अमेरिका ने ढीठ और उंदंड की तरह तर्क गढ़कर अनेको देशों, सभ्यताओं और जनजातियों का शिकार किया है। वर्तमान दौर में ईरान और वेनेजुएला में किए गए अमेरिकी हमले को भला हम इसके अलावा किसी तरह से देख सकते हैं।

आइए अमेरिकी महानता की वीभत्स क्रूरता, लोकतंत्र के पाखंड और अमेरिका द्वारा विश्व जन गण के साथ किए गए अपराधों की फेहरिस्त पर एक संक्षिप्त नजर डालते हैं।

विश्व शांति और अमेरिकी झूठ-ईरान पर अमेरिकी और इजरायली गठजोड़ के हमले के बाद दुनिया भर में इस बहस का उठना लाजिमी है कि अमेरिकी नेतृत्व वाला गठजोड़ क्या विश्व शान्ति और मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। इसी वर्ष के पहले दिन ही अमेरिकी राष्ट्रपति के सीधे निर्देशन में अमेरिकी सेना ने रात के अंधेरे में एक स्वतंत्र सार्वभौम राष्ट्र वेनेजुएला पर हमला किया।

जनता द्वारा चुने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया को एक गुप्त सैन्य अभियान में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ कर अपराधी की तरह घसीटते हुए अमेरिका ले जाकर जेल में डाल दिया गया। अब उन पर अनर्गल आरोपों में मुकदमा चलाने का प्रहसन होगा। यह लैटिन अमेरिका की पहली घटना नहीं है। इसके पहले ग्रेनाडा पनामा से लेकर चिल्ली और कोलंबिया तक इतिहास अपने को दोहरा चुका है।

इस समय ट्रम्प क्यूबा को धमकीं दे रहे हैं कि वह अमेरिका के साथ समझौता कर ले। नहीं तो उसका भी वही हश्र होगा। जो वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो का हुआ है। पिछले 1 वर्ष से डोनाल्ड ट्रम्प भारत सहित दुनिया के अनेकों देशों को धमका रहे हैं कि अमेरिकी शर्तों पर व्यापार समझौते करो। नहीं तो तुम्हें हमारे क्रोध का शिकार होना पड़ेगा।

जबसे दूसरे महायुद्ध के बाद विश्व साम्राज्यवाद के नेतृत्व की बागडोर संयुक्त राज्य अमेरिका के हाथ में आई है।तभी से अमेरिका 80 से ज्यादा मुल्कों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष युद्ध थोप चुका है। विरोधी सरकारों को अस्थिर करने और गिराने का खेल खेलता रहा है। इस खुले अपराध का बुनियादी कारण यह है कि तथाकथित पश्चिमी लोकतंत्र मूलतः बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हाथ का एक हथियार है।

जो उनके मुनाफे की बेलगाम हवस को संतुष्ट करने के लिए दुनिया में किसी भी समय किसी बहाने हमला कर अस्थिरता पैदा कर सकता है। ऐसी सैकड़ों नज़ीरें है। जहां अमेरिका ने सीधे सैन्य कार्रवाई की है। इसका सबसे डरावना उदाहरण जापान में नागासाकी हिरोशिमा है। जहां अमेरिका ने परमाणु बम उस समय फेंका। जब जापान आत्मसमर्पण करने जा रहा था। जिससे जापान के दो शहर पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गये। लाखों लोग मारे गए या विकलांग हो गये।

आज भी मानवता के खिलाफ किऐ गए अमेरिकी अपराध की सजा वहां के नागरिकों को भुगतना पड़ रही है। जापान चाहे कितना ही समृद्ध मुल्क क्यों न बन जाए। उसे आज भी अमेरिकी सैन्य छतरी के नीचे जीना पड़ रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व का जीयोपालिटिकल सीनेरिओ पूरी तरह बदल गया। पूंजीवाद अपने फासीवादी अवतार की सजा भुगत रहा था और दुनिया में समाजवादी क्रांतियों की तेज लहर चल रही थी। एक तरफ जहां समाजवादी ब्लॉक का विस्तार हुआ। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका पश्चिमी पूंजीवादी खेमा का एक क्षत्र नेता बन गया। पूंजीवाद व राजतंत्र के समक्ष अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा।

पूर्वी एशिया में चीन, कोरिया सहित कई देशों में समाजवादी क्रांति आगे बढ़ रही थी। जिससे विश्व का जियो पोलिटिकल संतुलन बदलने वाला था। यूरोपीय फासीवाद का कुफल सबसे ज्यादा यूरोप को ही भोगना पड़ा और यूके की बादशाहत चली गई। जिसका अधिकतम लाभ यूएसए को मिला। परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के कारण पश्चिमी पूंजीवाद की सुरक्षा और रहनुमाई का दायित्व अमेरिका ने ले लिया।

अमेरिका के नेतृत्व में न्यू वर्ल्ड आर्डर विकसित हुआ। सैनिक संधियों द्वारा दुनिया के अधिकांश देशों को अमेरिकी नियंत्रण में खींच लाया गया। जिसमें नाटो सबसे बदनाम और आक्रामक सैन्य गुट है। इसके बाद अमेरिकी सैन्य औद्योगिक काम्प्लेक्स का तांडव शुरू हुआ। अमेरिका ने दुनिया के विभिन्न कोनों में 750 से ज्यादा सैनिक अड्डे खड़े किये। जिसमें जापान में 120, जर्मनी में 119 और दक्षिणी कोरिया में 73 हैं। ये सैन्य बेस 80 मुल्को में फैले हैं। अनुमान है कि इन पर 1 .75 लाख अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।

इसके अलावा सीआईए जैसी खुफिया एजेंसियों ने दुनिया भर में अद्दश्य और खौफनाक जाल तैयार किया। जिसकी पहुंच नव स्वतंत्र देशों, बादशाहों से लेकर समृद्ध मुल्कों के राजनेताओं राजनीतिक दलों और औद्योगिक घरानों तक थी। समाजवादी क्रांतियों के डर से घबराए हुए पूंजीवादी सत्ता लोलुप जनविरोधी नेताओं पार्टियों को अपने जाल में फंसाकर अमेरिका ने अपने साम्राज्यवादी हितों का विस्तार किया।

पिछड़े और विकासशील मुल्कों में सैन्य उद्योग और राजनीतिक दलों के गठजोड़ को सीआईए ने अमेरिकी औद्योगिक मिलिट्री काम्प्लेक्स के हित से जोड़कर अमेरिकी विश्व रणनीति को आगे बढ़ाया। पूंजी की ताकत पर बुने हुए अदृश्य जाल द्वारा दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक राष्ट्रवादी सरकारों का शिकार किया गया। अमेरिकी ने जब जहां चाहा तख्ता पलट कराया। विशाल सैन्य शक्ति द्वारा अमेरिका दुनिया भर में सरकारें बनाने बिगड़ने और अमेरिकी पिट्ठुओं को सत्ता पर बैठाने उतरने का खेल खेलने लगा।

अधिकांश नव स्वतंत्र देश और अप्रासंगिक हो चुकी राजशाही व्यवस्थाएं अमेरिकी छत्रछाया में जीने लगी। जिन्होंने विरोध किया। उन्हें कुचल दिया गया। जिसे आज हमने नग्न रूप में वेनेजुएला में देखा और ईरान में रिजीम चेंज करने के नाम पर वही हो रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध के तत्काल बाद चीन में जनवादी क्रांति शुरू हुई। जिसे रोकने के लिए अमेरिका ने पूरी ताकत लगा दी। लेकिन अमेरिका चांग काई सेक की सरकार बचा नहीं सका। अंत में उसे चीन के समुद्री द्वीप ताइवान में ले जाकर बैठा दिया गया और आज भी ताईवान में अमेरिकी सैन्य ताकत के बल पर कठपुतली सरकार मौजूद है। यही हालत दक्षिण कोरिया, जापान, थाईलैंड के साथ पूर्वी और दक्षिणी पूर्वी पश्चिमी एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की है।    

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों की योजना के तहत किया गया। लेकिन समाजवादी ब्लॉक के ताकतवर हो जाने के कारण उसे सोवियत संघ और चीन को भी मान्यता देनी पड़ी। यूएनओ का मूल उद्देश्य था। विश्व में एक सर्वमान्य घोषित नीतियों पर अमल करना। (यूएन चार्टर)।जिससे वैश्विक शांति व राष्ट्रों की स्वतंत्रता संप्रभुता सार्वभौमिकता और आत्मनिर्णय के अधिकार की गारंटी की गई थी।

लेकिन यूएनओ और यूएन सुरक्षा काउंसिल पर अमेरिकी नेतृत्व में पश्चिमी मुल्कों का वर्चस्व होने के कारण ये संस्थाएं अपने बुनियादी उद्देश्य से भटक गई और अमेरिकी नेतृत्व में बने साम्राज्यवादी वर्ल्ड ऑर्डर के हितों की रक्षा कवच बन गई।       

जिसका स्वाभाविक परिणाम हुआ कि यूएनओ विश्व में चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष और फ़ैल रही समाजवादी क्रांतियों को रोकने के हथियार में बदल गया। युद्धोत्तर विश्व में भारत की स्वतंत्रता और चीनी समाजवादी क्रांति की विजय से स्वतंत्रता समानता और न्याय पर आधारित दुनिया बनाने के आंदोलनों को बल मिला। यूरोपीय उपनिवेशवाद के युग का अंत हो गया।सबसे पहले भारत स्वतंत्र हुआ।

उसके बाद चीनी क्रांति के सफल होते ही 1951 में कोरिया में समाजवादी क्रांति शुरू हो गई। जिसको रोकने के लिए अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की और कोरिया को दो भागों में बांट दिया गया। विश्व साम्राज्यवाद का नेता बनने के बाद अमेरिका की पहली सैनिक कार्रवाई कोरिया प्रायद्वीप में हुई और उसे दो भागों में बांट दिया गया। नवजात चीनी जनवादी गणराज्य ने अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के बाद कोरियाई क्रांति को बचाने के लिए अपने सैनिक भेजें। अमेरिकी सेना की हार हुई और कोरिया को दो भागों में बट गया।

उत्तरी कोरिया स्वतंत्र समाजवादी गणराज्य बना। दक्षिणी कोरिया वस्तुतः अमेरिकी सेना के संरक्षण में नवउपनिवेश बन गया है। उसकी सीमा पर अमेरिकी सैनिक तैनात है और दक्षिण कोरिया की जिओ पॉलिटिक्स का नियंत्रण अमेरिका के हाथ में है।

यह अमेरिका के नेतृत्व पहला युद्ध था। जिसे साम्यवाद को रोकने के नाम पर लड़ा गया। जिसमें हजारों बेगुनाह मारे गये। बदले हुए ऐतिहासिक संदर्भ में अगर देखा जाए तो दक्षिण कोरिया अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया का पहला नव उपनिवेश बना। इसके बाद नवउपनिवेशिक देशों की एक श्रृंखला शुरू हो गई। इसके दायरे में संपूर्ण लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और पूर्वी एशिया के अनेक देश आ गए। जो अमेरिकी विश्व रणनीति का अंग बन गए।अमेरिकी साम्राज्यवाद ने यही रणनीति चीन में अपनाईं गई ।

1971 तक अमेरिका ताईवान की चांग काई सेक सरकार को ही चीन का वास्तविक प्रतिनिधि मानता था और राष्ट्र संघ में उसे स्थाई सदस्य सदस्यता प्राप्त थी। जहां अमेरिकी सैनिक हड्डे आज भी मौजूद है। यहां याद रखना चाहिए कि साम्राज्यवादियों की मुख्य रणनीति रही है देशों का विभाजन करना। इसी के तहत भारत का विभाजन हुआ। जर्मनी, वियतनाम, कोरिया आदि देशों को दो भागों में बांटना। बाद में यूगोस्लाविया और अल्बानिया को भी कई टुकड़ों में बांट दिया गया। जिससे साम्राज्यवादी लूट को सुनिश्चित किया जा सके।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिका के नेतृत्व में नए तरह के उपनिवेशीकरण का अभियान चल रहा है। जहां भी लोकतंत्र बचाने के नाम पर अमेरिका कदम रखता है। वहां सैन्य अड्डे बना लेता है। उन देश में कठपुतली सरकारें खड़ी कर अपने आर्थिक राजनीतिक हितों को साधता है। आज के वेनेजुएला को देखकर हम पाकिस्तान, फिलिपींस, खाड़ी के इस्लामिक देशों और लैटिन अमेरिका से लेकर थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान तक की सरकारों की वास्तविक हैसियत समझ सकते हैं।

इसी हफ्ते ट्रंप ने नाटो के देशों खासकर यूरोप से अपने सैनिक जहाज़ स्टे़्ट आप होर्मुज को खुलवाने के लिए भेजने को कहा। जापान सहित यूरोपीय देशों ने इनकार कर दिया। इस पर ढिठाई के साथ ट्रंप ने यूरोपीय देशों को उनकी हैसियत दिखाते हुए कहा कि अमेरिका के बिना आपकी कोई औकात नहीं है। अगर हम हाथ खींच लेंगे तो यूरोप का नामोनिशान मिट जाएगा। नाटो के देश कागजी बाघ हैं।

कोरियाई से शुरू हुई अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप की श्रृंखला लंबी होती गई। कोरिया और चीन में अमेरिका ने “साम्यवादी खतरे से दुनिया को निजात दिलाने के लिए” सेना भेजी थी। अमेरिकी सेन्य हस्तक्षेप नागरिकों की हत्या और संसाधनों के विध्वंस और लूट में बदल जाता है। सैन्य हस्तक्षेप के अमेरिकी तर्क अलग-अलग देशों में अलग-अलग होते हैं।

जैसे वियतनाम, कोरिया, ग्रेनाडा मैं सैनिक हस्तक्षेप और चिल्ली, इंडोनेशिया, पनामा में चुनी हुई वाम सरकारों के तख्ता पलट का उसका घोषित लक्ष्य साम्यवाद को रोकने के साथ लोकतंत्र व नागरिकों की आजादी मानवाधिकारों की बहाली था। वहीं इराक, लीबिया, सीरिया और ईरान में अलग तरह के तर्क गढ़े गए ।

दुनिया जानती है कि इराक़ में सद्दाम हुसैन की हत्या और पूरे देश को तहस-नहस कर देने के पीछे अमेरिका और नाटो का तर्क था कि सद्दाम हुसैन मानवता के विनाश के हथियार विकसित कर रहे हैं। जबकि यह सरासर झूठ था। बाद में ब्रिटिश पीएम टोनी ब्लेयर ने दुनिया से इस बात के लिए माफी मांगी थी कि “यह जानते हुए कि झूठ है कि इराक किसी तरह का विनाशक हथियार बना रहा है” वे अमेरिका के साथ इराक पर हमले में शामिल हुए थे।

10 वर्ष तक चले इस युद्ध में 5 लाख से ज्यादा बच्चे भूख और बीमारी से मर गए। लाखों बेगुनाह नागरिक मारे गए। इराक मलबे के ढेर में बदल गया। आज इराक अमेरिका का नवउपनिवेश है। तबाह और बर्बाद इराक़ में अमेरिकी कठपुतली सरकार चल रही है। इराकी तेल और प्राकृतिक संपदा अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां गिद्धों की तरह नोच रही हैं। ‌ ‌‌

लीबिया, सीरिया, मिस्र में अमेरिकी हस्तक्षेप इन देशों की आवाम को तानाशाही से मुक्त करना था। लोकतंत्र बहाली के नाम पर किया गया हमला वस्तुतः इन देश के इंफ्रास्ट्रक्चर की बर्बादी और सामाजिक अराजकता का कारण बन गया है। इन सभी देशों में कट्टर इस्लामी ग्रुप सत्ता में आ गए हैं। जो लंबे समय से अमेरिकी सीआईए और इजरायली मोसाद के सहयोग से सक्रिय थे। आज ये देश अराजकता के शिकार हैं। आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक ढांचा बिखर गया है।

तानाशाह कठपुतली सरकारें अमेरिका के आर्थिक राजनीतिक हितों के लिए अनुकूल होती है। साम्राज्यवादी लूट और हस्तक्षेप के खिलाफ अरब जगत में जो भी राष्ट्रवादी प्रतिरोध था। उसे कुचल दिया गया है और यहां की तेल संपदा पर अमेरिकी तथा यूरोपीय कंपनियों का एकछत्र कब्जा है। लोकतंत्र और मानवाधिकार की लफ़्फ़ाज़ियों के नाम पर तेल के टैंकर अमेरिका और यूरोप की चमकीली दुनिया के लिए जा रहे हैं। अरबी अवाम बादशाहों की सत्ता में जीने के लिए मजबूर है। जिन्हें सिर्फ मजहब के आधार पर वैधता प्राप्त है।

वही भोथरे और चुके हुए तर्क ईरान पर हमले के लिए इस्तेमाल किए गए। ईरान में कट्टरपंथी इस्लामी ताकते सत्ता पर काबिज हैं। यह ईरानी अवाम को पता है। वह उसके खिलाफ लड़ती रही है। लेकिन अमेरिकी चिंता पाखंड है।

ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान उनके तथा अमेरिका के लिए खतरा है। क्योंकि ईरान न्यूक्लियर हथियार विकसित कर रहा है। गजा पर इजरायली बर्बरता के बाद इस्लामी तानाशाही हुकूमतों के होने पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं। इजरायल ने पिछले दो सालों में 75 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी लोगों की हत्या की है। यह खुले अमेरिकी समर्थन के कारण हो रहा है। ईरान फिलिस्तीन के साथ है और इजराइली कब्जे का विरोधी है। वह दो राष्ट्र के सिद्धांत का पक्षधर है। जो संयुक्त राष्ट्र परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव है।

ईरान ग्रेटर इजरायल के अप्राकृतिक लक्ष्य के रास्ते में एकमात्र बाधा है। इसलिए झूठे बहाने से ईरान पर हमला किया गया। जिसमें उसके सर्वोच्च धार्मिक नेता और बड़े अधिकारियों सहित हजारों नागरिक मारे जा चुके हैं। ईरान की धरती को बारुदो और जहरीले रसायनों से भर दिया गया है।

यही सब वियतनाम में भी हुआ था। उसकी एक-एक इंच धरती पर टनों बम गिराए गए थे। लेकिन वियतनामी प्रगतिशील राष्ट्रवाद और जनता की लोकतांत्रिक चेतना को मिटाया नहीं जा सका और अमेरिका को उसके इतिहास की सबसे बड़ी हार का मुंह देखना पड़ा था। वियतनाम का एकीकरण हुआ और अमेरिका की एशियाई रणनीति को धक्का लगा। वियतनाम में हज़ारों नागरिक मारे गए। बरसों तक वियतनामी जनता अमेरिकी लोकतंत्र के बम व बारूद का कुफल झेलती रही।

लेकिन मार्क्सवादी विचार दर्शन ने जिस महान वियतनामी राष्ट्रवाद को गढ़ा। आज वह दुनिया का एक समृद्ध मैनुफैक्चरिंग हब बन गया है।

अफगानिस्तान में वामपंथी सरकार को हटाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान और इस्लामी मुल्कों के सहयोग से तालिबानियों को सशस्त्र शक्ति के रूप में खड़ा किया। लम्बी लड़ाई के बाद तालिबानियों ने काबुल पर कब्जा कर लिया। लेकिन अफगानी राष्ट्रवाद के साथ अमेरिकी उपनिवेशवादी परियोजना टकरा गई। परिणाम स्वरूप तालिबान और लादेन के साथ अमेरिका का झगड़ा शुरू हो गया। जो 9/ 11 के अमेरिका पर हमले के साथ चरम पर पहुंचा।

इस्लामी आतंकवाद के खात्में के नाम पर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। यह युद्ध 10 वर्षों तक चला। जिसमें अमेरिका को भारी क्षति उठानी पड़ी। अंत में अफगानिस्तान से अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। अफगानिस्तान में अमेरिकी पराजय अमेरिकी हेजीमोनी के मार्ग में ऐसा मोड़ था, जिसने महाबली अमेरिका के पतन की पटकथा लिख दी।

हम जानते हैं कि हमास को खत्म करने के नाम पर इजरायल ने फिलीस्तीनियों का विश्व इतिहास के सबसे क्रूर नरसंहार किया। इस्लाम की दुहाई देने वाले सऊदी कतर, बहरीन, कुवैत, यूएई जैसे इस्लामी मुल्कों के बादशाहों के अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण के बिना यह नरसंहार संभव नहीं था। इनका बिरादराना इस्लाम सिर्फ इनकी सत्ता की सुरक्षा तक सीमित है। अगर ये मुल्क चाहते तो इज़राइल बच्चों समेत 75 हजार से ज़्यादा नागरिकों का कत्लेआम नहीं कर पाता।

56 इस्लामी मुल्कों में सिर्फ ईरान ने खुलकर फिलिस्तीनियों का समर्थन किया। इसलिए इसराइल-अमेरिकी गिरोह ने ईरान को टारगेट किया है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही अमेरिका ईरान से चिढ़ा हुआ है। क्योंकि इस क्रांति ने अमेरिका के पिट्ठू रजा शाह पहलवी को सत्ता से बेदखल कर दिया था।

पहले ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप लगाया गया। फिर वहां मानवाधिकारों की रक्षा और लोकतंत्र की दुहाई दी गई। अंत में ट्रम्प ने ईरानी रिजीम बदलने का लक्ष्य रखा। जबकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग ईरान के परमाणु कार्यक्रम की जांच करता रहा है। ईरान जांच में सहयोग देता रहा। ‌ लेकिन मानव रक्त के का स्वाद चक चुका इजरायल दुनिया के किसी भी नियम को मानने के लिए तैयार नहीं है।

इजरायल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा कौन्सिल युद्ध अपराध का प्रस्ताव पास कर चुका है। जिस पर 124 देश के हस्ताक्षर है। बेंजामिन नेतन्याहू को युद्ध अपराधी घोषित किया गया है। जिसे इन 124 देशों में जाने पर गिरफ्तार किया जा सकता है। हमले के समय ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता चल रही थी।ओमान के अनुसार ईरान वार्ता में पूरी तरह से सहयोग कर रहा था।

वार्ता की सफलता इजराइल के लिए खतरे की घंटी थी। इसलिए इज़राइल ने ट्रम्प पर दबाव डालकर वार्ता के मध्य में ही ईरान पर हमला कर दिया। जो अब फैलता जा रहा है। विश्व शांति को युद्ध से खतरा पैदा हो गया है। इसके लिए अमेरिका और इज़राइल दोषी हैं। यही कारण है कि नाटो के अधिकांश देश और अमेरिकी सरकार के कई अधिकारी युद्ध का विरोध कर रहे हैं। यह वस्तुत: दो असमान शक्तियों का बीच का संघर्ष है। जिसमें अपेक्षाकृत कमजोर ईरान अपने न्यायोचित अधिकारों के लिए लड़ रहा है।

अमेरिका के हाथ में पूंजीवादी विश्व का नेतृत्व आने के बाद उत्तर कोरिया पर पहला अमेरिकी आक्रामक था।यहां से दुनिया में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप शुरू हुआ। जो आज तक जारी है। इसके बाद 1961 में क्यूबाई क्रांति को रोकने के लिए अमेरिका ने हर संभव कोशिश की। लेकिन सोवियत संघ के परमाणु संपन्न देश बन जाने के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। तब से अमेरिकी खूनी रथ दुनिया को रौंदते हुए इस धरती के कितने भूखंडों में कितनी वैश्विक त्रासदियां पैदा कर चुका। इसका आकलन करना आसान नहीं होगा।

1967 में इंडोनेशिया में वामपंथी सरकार बनी। कुछ दिन बाद ही अमेरिका ने सैनिक तख्ता पलट कराकर सरकार के पदाधिकारी सहित संसद के प्रतिनिधियों तक की हत्या करा दी। एक मोटे आकलन के अनुसार 9 लाख से ज़्यादा वामपंथी कार्यकर्ता बुद्धिजीवी और सामान्य नागरिक मारे गए। तबसे इंडोनेशिया अमेरिकी सैन्य औद्योगिक काम्प्लेक्स के लौहजाल में जकड़ा अच्छे भविष्य का इंतजार कर रहा है।

दुनिया को पता है कि 1973 में चिली में अमेरिका ने चुनी हुई साल्वाडोर आलिंदें की वामपंथी सरकार का सैन्य तख्ता पलट कराकर राष्ट्रपति सहित मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्योंकी हत्या करा दी थी। 27 वर्ष तक चिली अमेरिकी नियंत्रित सैन्य तानाशाही में छटपटाता रहा है। 1979 में ग्रेनाडा के कम्युनिस्ट राष्ट्रपति का अमेरिका ने अपहरण किया और पनामा की वामपंथी सरकार को कुचलने के लिए सैनिक अभियान चलाए।

इन सैन्य अभियानों में लाखों लोग या तो मारे हो गए या प्रभावित हुए। तबसे लेकर आज तक लैटिन अमेरिकी देश यूएसए के आर्थिक लूट और राजनीतिक नियंत्रण के गवाह हैं। लैटिन अमेरिका की दरिद्रता, भुखमरी, बेरोजगारी और पिछड़ापन और राजनीतिक अस्थरता अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के खूनी खेल की गवाही दे रही हैं।

कम्युनिस्ट क्रांति को रोकने के लिए अमेरिका ने वियतनाम पर हमला किया। यह युद्ध बरसों चला रहा जिसमें लाखों लोग मारे गए। सैन्य शक्ति से वियतनाम को दो टुकड़े में बांट दिया गया। वियतनाम में समाजवादी क्रांति को कुचलना के लिए अमेरिका ने दुनिया का सबसे बड़े युद्ध अपराध किया और पूरे उत्तरी वियतनाम को बम बारूद से पाट दिया था। लेकिन कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की अजेय जिजीविषा व स्वतंत्रता की आकांक्षा के सामने अमेरिका को पहली बड़ी पराजय झेलनी पड़ी।

1975 तक आते-आते वियतनाम, लाओस, कंबोडिया, अमेरिकी नियंत्रण से मुक्त हो गये। लेकिन वही फिलिपींस, थाईलैंड, बर्मा, मलेशिया, इंडोनेशिया अमेरिकी नियंत्रण से आजाद होने के लिए संघर्षरत हैं।

उदारीकरण के बाद पिछले 35 वर्षों में दुनिया बदल चुकी है। साउथ ग्लोबल आर्थिक ताकत बन गया है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब और आर्थिक शक्ति बन गया है। जिससे अमेरिकी हेजीमोनी खत्म होने की कगार पर है। 

अमेरिकी नियंत्रण में बने वर्ल्ड ऑर्डर को कनाडाई पीएम मार्क कार्नी आभासी सुरक्षा और संतुष्टि का मॉडल कहा हैं। वह कहते हैं कि यह जानते हुए कि हमारी स्वतंत्र हैसियत न के बराबर है। फिर भी हम (यानी पश्चिमी देश जिसे वह मिडिल पावर कहते हैं) विश्व शक्ति होने के आभासी खयाल में जी रहे थे। उनका कहना था कि अमेरिकी छतरी के नीचे हमें एक हद तक सुरक्षा व्यापार सुगमता और राजनीतक संतुष्टि मिलती थी। जो अब ध्वंस के कगार पर है।

उनका कहना है द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी सभी वैश्विक संस्थाएं जैसे यूएनओ, डब्लूटीओ, आईएमएफ, विश्व बैंक और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, ह्यूमन राइट आर्गेनाईजेशन जैसी संस्थाएं अब अप्रासंगिक हो गई हैं। सोवियत संघ बिखर चुका है । विश्व के यूनीपोलर हो जाने के बाद अमेरिकी हेजेमनी ने सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अप्रासंगिक बना दिया है । जो अमेरिका नियंत्रित आभासी न्यायोचित विश्व व्यवस्था के अंत का कारण बना्।

बर्बर मध्यकाल के लगभग 15 सौ में वर्षो जितने युद्ध, हत्याएं, प्राकृतिक संपदा और समाजों सभ्यताओं का विनाश और दमन हुआ, उससे सैकड़ों गुना ज़्यादा अमेरिकी वर्चस्व के 80 वर्षों हो चुका है। हमें उम्मीद है कि महान पर्शियन सभ्यता से टकराकर अमेरिका नियंत्रित सैन्य औद्योगिक गठजोड़ के वर्चस्व की अमानवीय व्यवस्था अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है और अमेरिकी साम्राज्यवाद के वर्चस्व के अंत की पटकथा स्वतंत्रता समानता बंधुत्व और सार्वभौमिक राष्ट्र के नायकों द्वारा लिखी जाने लगी है।

(लेखक किसान नेता हैं।) 

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